गरिबोंका आर्थिक विकास
विकास के इस दशकमे देशकी ७० फीसदी आबादितक विकासके लाभ बहुत कम मात्र में पहुंचे है.
जैसेही हम निम्न ताबकेकी और बढ़ना शुरू करते है, विकास की चमकीली कहानी फीकी पड़ने लगती है.
आज भारतमे विकासकी गति विषमता पूर्ण है.
जहा आमिर तेजीसे और आमिर होते जा रहे है, वहा गरीबोंकी स्थिति या तो यथावत है या फिर वो और गरीब होते जा रहे है.
अगर हमें सच्मेही भारतको गरिबिसे मुक्त करना है तो यहाँ कुछ बातोंपर गौर करिए. यहाँ बातें या विकास्केलिये अनुकूल बिंदु मुझे श्रीमती इला भट्ट द्वारा लिखे गए "बत्तीस के फेर में गरीबी", दैनिक भास्कर दी. २७/९/२०११ इस लेखसे मिले है जो मुझे अच्छे और तर्क पूर्ण लगे है.
श्रीमती इला भट्ट
१) समावेशी विकास: हमें अपना ध्यान अर्थव्यवस्था के विकास के स्थान पर देश के सभी नागरिको के आर्थिक विकास पर केन्द्रित करना चाहिए.
२) न्यनतम पारिश्रमिक: न्यनतम पारिश्रमिक की घोषणा होनेके बावजूद आय की दर बहुत कम है. सब लोगोंको कमसे कम न्यनतम पारिश्रमिक का पूरा हिस्सा मिलना चाहिए ताकि वे लोग अपना गुजर बसर ठीक ढंगसे कर सकें.
३) स्वास्थ्य सुविधाए: गरीबोंकी कर्ज के दुश्च्क्रमे झोंक देने में चिकित्सा व्ययका अहम योगदान है. इस बात का ध्यान रखा जाना चाहियेंकी सभी लोगोंको अच्छी गुणवत्ता की स्वास्थ्य सुविधाए मिल सकें.
४) खाद्य सुरक्षा: अनाज, शक्कर, सब्जिया एन जैसी जीवनावश्यक खाद्य पदार्थोके भाव स्थिर और कम रहना चाहिए.
५) अच्छी गुणवत्ताकी शिक्षा: गरीब परिवारोंके बच्चोको बगैर कर्ज लिए अच्छी गुणवत्ताकी शिक्षा मुहैया करना चाहिए.
6) सभी विकासके लाभोका स्थानियीकरण होना चाहिए.
आठ फीसदी से अधिक विकास दर के दशक में नागरिकोंसे ३२ रुपये रोज में जीवन निर्वाह्की अपेक्षा रखना असंगत है. अगर भारत की गरीब जनताका विकास नहीं तो यह आठ फीसदी विकास्भी ज्यादा दूर तक नहीं रहेंगा.
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